| नीली आँखों वाली परी – hindi kahani |
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hindi kahani – नीली आंखों वाली परी
बहुत पुरानी बात है राजा कर्ण सिंह एक बहुत दानी राजा थे उनकी दानवीरता कि हर तरफ प्रशंसा होती थी उनके दरवाजे से कभी कोई खाली हाथ नहीं जाता था। उनको एक बात का सबसे बड़ा दुख था उनकी कोई संतान न थी। 1 दिन किसी त्योहार का समय था और राजा के महल के सामने दान लेने वालों की बहुत लंबी कतार थी।
दान देने का सारा सामान खत्म हो चुका था, लेकिन अंत में एक बुढ़िया जिसकी कमर झुकी हुई थी जब उसकी बारी आई तब तक राजा के पास कोई सामान ना था। राजा ने जैसे उसको देखा उन्होंने अपने गले का बहुमूल्य हार निकाल कर उसके गले में डाल दिया वह बूढ़ी औरत बहुत खुश हुई। और राजा को आशीर्वाद देते हुए चली गई।
राजा जब अपने बगीचे में बैठे हुए थे अचानक एक आम का फल नीचे गिरा। जैसे ही राजा ने उसे उठाना चाहा कहीं से आवाज आई राजा कर्ण सिंह इस आम को अपनी रानी को खिला दें, उनको संतान की प्राप्ति हो जाएगी। यह सुन कर राजा आगे पीछे घूम कर देखने लगे लेकिन वहां कोई ना था, तब उनके बगीचे में एक बहुत खूबसूरत नीली आंखों वाली परी खड़ी थी राजा ने उसे देखा और कहा आप कौन हैं और यहां क्या कर रही है तब नीली आंखों वाली परी ने कहा आपने मुझे नहीं पहचाना नहीं। राजा ने कहा मैंने तो आपको पहली बार देखा है।
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नीली आंखों वाली परी बोली याद करें, कल जब आप दान दे रहे थे उस कतार में सबसे अंत में आपने जिसको दान दिया था। वो बूँढी औरत मैं ही तो थी। यह देखिए आपने जो हार दिया था वह मेरे गले में है। मैं आपकी दानवीरता से बहुत प्रसन्न हूं। आपकी इतने वर्षों की तपस्या सफल हो गई। यह आम का फल आज शाम को रानी को खिला दीजिए और अगले 9महीने बाद रानी एक पुत्र को जन्म देगी. आपके भाग्य में संतान सुख नहीं है लेकिन आपने अपने कर्मों से संतान सुख प्राप्त किया है, जो आपको सिर्फ 21 साल की उम्र तक मिलेगा।
उसके विवाह के कुछ दिनों बाद ही उसकी मृत्यु हो जाएगी राजा कर्ण सिंह ने निराश होकर उस नीली आंखों वाली से कहा। कोई उपाय नही है इस मृत्यु को रोकने का। तब परी ने कहा आप एक काम करिएगा जब आपके बेटे की मृत्यु हो जाएगी तब आप उनकी अंतिम क्रिया मत करिएगा बल्कि उसको एक संदूक में रखकर चार दही के मटको के साथ किसी जंगल में छोड़ दीजिएगा। राजा ने उदास मन से कहा ठीक है। इसके बाद राजा वापस आ गए और उन्होंने वह आम अपनी बीवी को खिला दिया।
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उससे ठीक 9 महीने बाद उनके घर संतान पैदा हुई। राजा के महल में खुशियां छा गई बहुत से लोगों को बुलाया गया। दावत में नीली आंखों वाली परी भी आई। बहुत बड़ा आयोजन किया गया राजा ने भी दिल-खोलकर दान दिया। राजकुमार का नाम देव रखा गया राजा और रानी की खुशी की सीमा नहीं थी।
कुमार धीरे-धीरे बड़ा होने लगा। समय बीत गया राजा और रानी को परी की कही हुई बात भूल भी गई। जब राजकुमार 21 वर्ष का हुआ तब उसके विवाह के अनेक प्रस्ताव आने लगे और राजा ने एक सुंदर और बुद्धिमती राजकुमारी वत्सला के साथ उसका विवाह कर दिया। लेकिन विवाह के कुछ दिनों के बाद ही राजकुमार दीप परलोक सिधार गए।
महल में चारों तरफ़ हाहाकर मच गया। चारों तरफ मातम छा गया। जब राजकुमार को अंतिम क्रिया के लिए ले जा रहे थे तब राजा को अचानक नीली परी की कही हुई बात याद आई। उन्होंने कहा राजकुमार को जलाने की जरूरत नहीं है। उन्होंने एक संदूक मंगवाई और भारी मन से उसमें राजकुमार का मृत शरीर रखवा दिया।
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उसके साथ चार दही के मटके भी रखवा दिए गए। राजा जंगल में गए और घने जंगलों के बीच संदूक को एक बड़े वृक्ष के नीचे रखवा दिया। वहाँ से लौटने के बाद उनका मन किसी काम में नहीं लगता था। राजकुमारी वत्सला अपने पिता के घर चली गई। राजा के महल में फिर से सुना पसर गया।
इस बात को 1 साल बीत गए। एक दिन राजकुमारी वत्सला अपने मायके में बैठी हुई थी, तभी एक भिखारी आया और उसने राजकुमारी से कहा मैं कई दिनों से बहुत भूखा हूं। मुझे कुछ खाने को दे दो। राजकुमारी वत्सला उसके लिए भोजन लेकर आई।
जैसे ही वत्सला ने उसको भोजन की थाली दी। उसने अपनी बंद मुठठी वत्सला के आगे कर दी।
वत्सला बिल्कुल चकित हो गई, उसने देखा कि उसके हाथ में उसके पति की सोने की चेन थी। जो मरने के बाद उसके पति के गले में थी। उसने भिखारी से पूछा बाबा सच सच बताओ आपको यह चैन कहां से मिली। भिखारी घबरा गया और डर के मारे उठकर भागने लगा। वत्सला ने उसको बहुत प्यार से हाथ पकड़ कर बैठाया और बोली बाबा इस चैन के बारे में जानकारी लेना मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
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तब भिखारी बोला एक बार मैं भटकते-भटकते घने जंगलों के बीच चला गया था। यह चैन वही एक संदूक के पास मिली थी। वत्सला बिल्कुल हैरान हो गई और बोली बाबा यह चैन मेरी पति की है और उस संदूक में मेरे पति का मृत शरीर था। मेरी आपसे विनती है, कि आप मुझे उस जगह पर ले चलिए। भिखारी घबराकर बोला अरे नही राजकुमारी, उस जंगल में बहुत भयानक राक्षस हैं।
आप वहाँ नहीं जा सकती वो आपको मार देंगे। राजकुमारी वत्सला ने सिसकियां लेते हुए कहा बाबा आपको मुझे वहां ले जाना ही होगा। भिखारी बड़ी मुश्किल से तैयार हुआ। राजकुमारी ने भिखारी के साथ जंगल की तरफ प्रस्थान किया। जब वो लोग जंगल में उस स्थान पर पहुंचने ही वाले थे तब भिखारी ने कहा राजकुमारी अब मैं आगे नहीं जा सकता यहां से थोड़ा सा आगे जाकर ही एक बड़े पेड़ के नीचे में संदूक है।
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राजकुमारी आगे बढ़ गई। वह भागती जा रही थी। अचानक उसने देखा कि एक पेड़ के ऊपर कुछ राक्षस उछल कूद कर रहे थे। वत्सला डर के मारे झाड़ी में छुप गई। रात हो गई थी थोड़ी देर में सारे राक्षस चले गये। तब राजकुमारी संदूक के पास पहुंच गई, उसने देखा कि राजकुमार उस संदूक में सोया हुआ था।
राजकुमारी उसको ठीक से देख भी नहीं पाई कि कहीं से उसे पायल की आवाज और घुंघरू की आवाज आने लगी। वह हड़बड़ा कर वही एक झाड़ी में छुप गई और उसे डर भी लग रहा था। लेकिन उसके पास इसके अलावा और कोई चारा भी नहीं था। वह शांस रोके बैठी हुई थी। चांदनी रात थी अचानक उसने देखा कि वहां 8 से 10 खूबसूरत परी आ गई। उनमें से एक परी की आंखें बिल्कुल नीली थी।
तभी नीली आंखों वाली परी संदूक के पास आई और उसने संधू का ढक्कन खोल दिया। उसके बाद उसने राजकुमार के सिर के पास रखी हुई एक लकड़ी उठाई और घूम कर उसके पैरों की तरफ आ गई लकड़ी उसने राजकुमार के पैर के पास रख दी और पैर के पास रखी हुई लकड़ी उठा ली उसको सिर के पास रख दिया।
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राजकुमार खड़ा हो गया और संदूक से बाहर निकल आया। सभी परियों ने उसको सहारा देकर बाहर निकाला और अपने साथ लाए हुए बहुत सारे फल मिठाइयाँ उसको खाने को दी। उसके बाद सब ने मिलकर बहुत देर तक नाच-गाना किया।और लगभग 2 घंटों के बाद उन्होंने राजकुमार से कहा अपने संदूक में चले जाओ।
नीली आंखों वाली परी ने फिर देव के सर की तरफ वाली लकड़ी पैरों के पास और पैरों के पास वाली लकड़ी सर के पास रख दी। राजकुमार संदूक में सो गया। सभी परियाँ आसमान में उड़ गई। अंधेरा गहरा गया, राजकुमारी ये सब देखकर एकदम से स्तब्ध हो गई। उसने जैसे-तैसे रात काटी।
जब सवेरा हुआ तो डरते डरते जंगल में निकल गई, वहाँ उसे झरना दिखाई दिया वहाँ उसने अपना मुंह धोया और पानी पिया। फिर वापस झाड़ी में आकर बैठ गई, राजकुमारी 3 दिनों तक सिर्फ पानी पी-पीकर झाड़ी में बैठी सब तमाशा देख रही थी। रोज रात को यही कार्यक्रम होता रहता। वह चुपचाप मूकदर्शक बनके देखती रही।
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1 दिन जब सारी परियाँ चली गई तब वह हिम्मत करके उठी और उसने संदूक ढक्कन खोल दिया। राजकुमार के सिर के पास की लकड़ी को पैर के पास रख दिया और पैर के पास पड़ी लकड़ी को सर के पास रख दिया। राजकुमार उठ कर बैठ गया। और जब उसने अपनी पत्नी राजकुमारी वत्सला को देखा तो अचानक खड़ा हो गया।
राजकुमारी ने उसको सहारा देकर बाहर निकाला। राजकुमारी उसको देखकर फूट-फूट कर रोने लगी। उसने कहा राजकुमार आपको इस तरह के जीवन से कैसे मुक्ति मिलेगी। आप यहां से वापस चलें। राजकुमार ने कहा नहीं अगर मैं चला जाऊंगा तो यह सब कुछ तहस-नहस कर देंगी। क्योंकि नीली आंखों वाली परी के वरदान से ही मुझे जीवन मिला था। और मेरा जीवन इतना ही था। तुम वापस घर चली जाओ।
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मेरी संदूक में घड़े में दही रखा हुआ है। उस दही को लेकर तुम मेरे माता-पिता के महल चली जाओ। वहां तुम अपना वेश बदलकर जाना ताकि तुम्हें कोई पहचान ना पाए और उसी महल में रहना कुछ समय बाद ही तुम्हारी कोख से मेरे बेटे का जन्म होगा। तब मैं तुमसे मिलने आऊंगा राजकुमार ने कहा। लेकिन इससे पहले तुम मुझे फिर से संदूक में जैसा था वैसा ही कर दो। राजकुमारी ने राजकुमार की सलाह मानकर वैसा ही किया। दही का घड़ा लेकर जंगल में भटकते भटकते अपने सास-ससुर के महल में पहुंच गई। उसने मुख पर घूंघट डाला हुआ था ताकि कोई उसे पहचान ना सके।
वह महल के फाठक पर जैसे ही पहुंची, उसने रानी मैत्री को संदेश भिजवाया कि वह बहुत तकलीफ में है। उसे रहने की जगह चाहिए। रानी से उसकी तकलीफ देखी ना गई और उन्होंने रहने के लिए महल के पीछे कमरा दे दिया। जब रानी को यह पता चला कि वह मां बनने वाली है, तब रानी ने उसके खाने-पीने का और उसकी देखभाल करने का पूरा बंदोबस्त कर दिया। राजकुमारी वत्सला ने कुछ महीनों के बाद एक बेटे को जन्म दिया।
रानी को जब यह पता चला, तब रानी ने उसके खाने-पीने और रहने की व्यवस्था और बढ़ा दी। एक दिन रात को जब सभी सो रहे थे। तब वत्सला की खिड़की का दरवाज़ा खटका उसने जब खिड़की खोली तो सामने राजकुमार देव खड़ा था। वह अपनी पत्नी से मिलने और अपने बेटे को देखने आया था। यह सिलसिला कुछ दिनों तक चलता रहा।
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रानी मैत्री ने 1 दिन किसी के बात करने की सुगबुगाहट सुनी। वह खिड़की के पास आ गई तब उसने अपने बेटे को पहचान लिया और उसने उसको पकड़ लिया। रानी ने कहा बेटा अब मैं तुझे नहीं जाने दूंगी तुम यहीं रहो। हमें नहीं पता था कि यह तुम्हारी पत्नी है और यह तुम्हारा बेटा है। राजकुमार ने कहा नहीं मां मैं नहीं आ सकता। इसका एक ही उपाय है, तुम इस बच्चे के होने का एक भव्य आयोजन करो और उन परियों को भी निमंत्रित करो। जब सब परियाँ आएँगी तब किसी तरह से मिली परी की बाहों में बधा हुआ बाजूबंद ले लेना।
उस बाजूबंद को अग्नि के हवाले कर देना और नीली आंखों वाली परी से मेरे प्राणों की भीख मांग लेना। शायद उसका दिल पिघल जाए और मैं वापस आ जाऊं। रानी ने डबडबाई आंखों से राजकुमार को विदा किया। दूसरे दिन ही पूरे महल में जोर-शोर से बच्चे के पैदा होने का जश्न मनाने की तैयारियां शुरू हो गई। उस जश्न में उन परियों को भी निमंत्रित किया गया।
रात को सभी परियाँ आयीं। नाच गाना शुरू हो गया। तभी बच्चा जोर-जोर से रोने लगा। नीली आंखों वाली परी ने उस बच्चे को गोद में उठा लिया तो बच्चा चुप हो गया। रानी मैत्री ने कहा – लगता है इसे आपका बाजूबंद पसंद आ गया है, तभी तो इतनी देर से रो रहा था और आपकी गोद में आते ही चुप हो गया। आप थोड़ी देर के लिए इसे अपना बाजूबंद दे सकती हैं। नीली आंखों वाली परी कुछ नहीं बोली। उसने वह बाजूबंद उतारा और बच्चे के पास रख दिया। रानी तो इसी मौके की तलाश में ही थी, उसने वह बाजूबंद उठाया और सबकी आंखों से बचाकर जलती हुई अग्नि में फेंक दिया।
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नीली आंखों वाली परी ने कहा आपने क्या किया? अब हम राजकुमार को अपने साथ नहीं ले जा पाएंगे। तब रानी उसके पैरों पर गिर पड़ी और बोली नीली आंखों वाली परी आपके वरदान से यह राजकुमार हमारे पास आया था। और आज आपसे हम इस राजकुमार के प्राण की भीख मांगते हैं।
नीली आखों वाली परी ने रानी मैत्री को कंधों से पकड़ कर उठाया और तथास्तु कहा। नीली आंखों वाली परी ने बच्चे को आशीर्वाद दिया और राजकुमार को भी गले लगाकर आशीर्वाद दिया इसके बाद में वह सब वहां से चली गई। राजकुमार वापस अपने महल में आ गया अपने परिवार में आकर वह बहुत खुश हुआ। राजा-रानी और राजकुमारी वत्सला के जीवन में फिर से खुशियां आ गई थी।
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